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Friday, October 26, 2018

"वह खामोश हो गया"


वह खामोश हो गया 

कंवर के घाट पर जलती हुई लाश, मेरे सबसे अजीज दोस्त, शेखर की थी | और उसकी लाश से निकलती हवा भी उसी ओर उड़ के जा रही थी जिस ओर घर था सुधा का | ऐसा सच में हो रहा था, या सिर्फ मुझे लग रहा था मुझे नहीं पता, पर हां मुझे भी जलन हो रही थी, इतना समर्पण देख के | सुधा और शेखर को मिलवाने का पूरा श्रेय नोवा साइकिल को जाता है| उनकी पहली मुलाकात तब हुई, जब सुधा परीक्षा देने जा रही थी, और अचानक से उसकी साइकिल की चेन उतर गई | पहले तो सुनसान रास्ते पर सुधा कुछ सहम सी गई, पर फिर शेखर को आता देख, थोड़ी राहत की सांस आई| अब यूं तो सुधा किसी भी ऐरे गैरे से बात करने की आदत तो थी नहीं, और शेखर का व्यक्तित्व भी इतना आकर्षक था नहीं | पर मरता क्या न करता | सुधा ने शेखर को रोक के चेन चढ़ाने को कहा, और शेखर नें भी तुरंत मदद कर दी | पहली मुलाकात का तोहफा एक मुस्कुराहट को अपनी आंखो में संजो के शेखर कई दिनो तक खुमारी में फिरता रहा | फिर मुझसे शेखर की तड़प देखी नहीं गई, मैंने सुधा का पता लगाया, कौन है, कहा से है | शेखर और मैं दोनों बिल्कुल सीधे शरीफ है, बस वो नाक जितना सीधा है, और मैं जलेबी ज़ितना | पता चला कि चौराहे के पास वाली कोचिंग में पढ़ती है | बहुत ज़ोर डालने पर शेखर भी उसी कोचिंग में गया पढ़ने, अब मुलाकात का सिलसिला बढ़ने लगा | मेरा शेखर जो कभी पढ़ने में निहायत कमजोर था, दिन रात पढ़ने लगा, ताकि उसकी नजरों में कुछ शान बन जाए| मैं आए दिन दुआ करता कि खुमारी बनी रहे, शेखर तरक्की की ओर बढ़ रहा था, सिर्फ सुधा के लिए | दिन कई बीतते गए, इक दिन शेखर ने सुधा को इजहार कर दिया |सुधा की खूबसूरती के कायल इंस्टीट्यूट में सभी थे, कोई बड़ी बात नहीं थी उसके लिए | सुधा नें झट जवाब दिया कि हम दोस्त अच्छे है | शेखर मुस्कुरा दिया, क्यूकि "हम दोस्त" है | इंकार के बाद भी मेरे दोस्त की चाहत में कमी ना आई | सुधा के कई दोस्त थे, शेखर से सुंदर बलिष्ठ, धनी, | शेखर को डर रहता था कि कहीं उसकी गरीबी उसकी मोहब्बत ना खा जाए | यूहीं दिन कई बीतते गए| इक बार, मास्टर जी नें शाम के समय की कक्षा ले ली | मानसून का मौसम था और सभी बच्चे जब बाहर आए, तबतक पूरा आसमां काले बादलों से घिर गया था | सुधा और शेखर के घर आने के रास्ते एक ही थे, पर सुधा ठाकुर साइकिल से आया जाया करती थी, और शेखर विश्वकर्मा पैदल ही पलायन करते थे |
अब आते समय फिर करिश्माई साइकिल नें अपना रंग दिखाया, और उतार फेकी चेन उसी जगह | रात का पहर था, ऊपर से बादल, चारो ओर सुनसान सड़क, और सुधा अपनी घबराहटों के साथ किसी आस की उम्मीद में रुकी हुई थी | शेखर को जब अचानक उसने आता देखा, तो कुछ राहत की सांसे आई | शेखर दूर से ही मसला समझ गया था, अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए, उसने पूछा कि का हुआ सुधा जी चेन हिंच गया का | लाइए हम ठीक किए देते हैं | और बैठ गया नीचे चेन चढ़ाने | फिर अचानक इंद्रदेव को जाने क्या सूझी, झमाझम बरसात हो गई | और अचानक जैसे एक हवा के झोंके नें सुधा को शेखर की बाँहों में फेंक दिया| शेखर इससे पहले कुछ कह पाता सुधा बुदबुदाने लगी, कि उस के इजहार का वो इकरार करती है | और हां उसे भी शेखर से मोहब्बत है, शेखर सन्न खड़ा था जैसे दुनिया भर की दौलत के बार में मिल गई हो | दोनों के अल्फाज़ कंपकाँपा रहे थे| शेखर नें सुधा के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा कि हम जानते थे ऐसा जरूर होगा | हमारा अराधना का मोल जरूर देंगे भगवन् |
वो रात बीती, अब सुधा और शेखर नजदीक नजदीक रहने लगे | शेखर नाचता, गाता, दिन भर मुस्कुराता रहता | मेरे दोस्त के चेहरे पर इक नूर आ गया था | शेखर की मोहब्बत देख के मुझे भी इश्क करने का मन हो उठता था | क्या चीज़ होती है मोहब्बत, वाह | सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, जबतक लोगो को खबर न हुई | इनकी नजदीकी भी फिर लोगों की आंखो में खटकने लगती थी | अक्सर लोग शिकायतें लेकर ठाकुर साहब के पास पहुंच जाते | पर सुधा और शेखर नें कभी ऐसा कोई मौका दिया ही नहीं, अब आगे बेबुनियाद इल्जाम लगते रहे भले | इक दिन ठाकुर जी नें झल्ला के सुधा को कोचिंग से हटवा दिया | शेखर अगर कोचिंग बदलता तो सबको शक होता, शेखर और सुधा की दूरियां बढ़ गई | दोनों ओर तड़प थी, शेखर की आंखों में सुधा को देखने की ख्वाहिश रहती थी | और शायद हाल तो सुधा का भी बुरा था | एक दिन सुधा का संदेशा आया, इक छोटी बच्ची के हाथों | लिखा था "सोमवार को मंदिर जाएंगे बहन के साथ, भैया बनारस जा रहे हैं, आओ मिलों तनक जरा | सुना है दुबर हो गए हो, खाना वाना छोड़ दिए हो का, आओ खबर लेते है तुम्हारी हम" |
चलो अच्छा हुआ दोनों मिलेंगे, यही सोच के मैं भी खुश था | मिलने का दिन आया तब शेखर पांच बजे से ही जाके मंदिर के पीछे पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गया | मिलने की बेकारारी थी, सुधा सात बजे तक आई | दोनों एक दूसरे को देख के खिल उठे | सुधा नें चहक के शेखर के दोनों हाथ पकड़ लिए और रोने सी लगी |  शेखर नें जवाब दिया, कि अब रोना मत वर्ना हम गुस्सा हो जाएंगे | कुछ बातें हुई, फिर अचानक सुधा कुछ बोलते बोलते कांपनें लगी | मुड़ के देखा तो सुधा के दोनों भाई पीछे ही खड़े थे | अपनी खानदानी तलवार हाथ में लिए | सुधा उछल के अपने भाई के पास, चली गई और चिल्लाने लगी भैया हमें मौका पाकर छेड़ रहा था देखिए | शेखर सन्न था, कुछ पलों के बाद पेड़ खून की छींटो से लाल हो गया | शेखर खामोश हो गया हमेशा के लिए| उसके भाई भी पागल थे, वो पहले ही मर चुका था, सुधा की बेवफ़ाई देख के |
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वाह! नारी तेरे रूप अनेक | नमन है |
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©® Kavi Agyat 

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1 comment:

  1. Suru me Padh kr nahi lga ki anjaam ye hoga......wakai bahut acchi story lagi👌👌

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