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Monday, October 1, 2018

"दवाइयों ने पिताजी को मार दिया" story by Kavi Agyat


लाल किले से मेट्रो स्टेशन, मेट्रो स्टेशन से जामा मस्जिद, यही दिनचर्या थी पिताजी की | एक साल पहले ही तो गये थे, भागलपुर से दिल्ली, रिक्शा चलाने | दादाजी के पास खेत खलिहान ज्यादा था नहीं, जितना था वो सब जब्त हो गया था | दादाजी बताते हैं कि वो खेत जो थोड़ा बहुत था, उनके पिताजी के दादाजी का था | उस वक़्त जब उन्होने उसे लिया था तब बंजर था | तब दादाजी के दादाजी के पिताजी ने, अपना खून पसीना बहाकर उसे फलने लायक बनाया था | अचानक एक सुबह पता चला कि वो जमीन सरकारी हो गई है, जब्त हो जायेगी | आश्चर्य हुआ क्यूंकि जितनी सरकार की उम्र है उससे पहले से वो जमीन हमारे पास है | दादाजी और पिताजी तब इस बात से काफी दुखी हुए थे, पर जब पता चला कि उस जमीन का लोक कल्याण के लिए इस्तेमाल होगा और उसके बदले उन्हे कहीं और जमीन दी जायेगी, तब लगभग दुख खत्म हो गया | कुछ दिन बीते जमीन मिली | दूर बियाबान में बंजर जमीन, नदी से काफी दूर, जहां पानी पहुंचाने के लिए भगीरथ जैसी तपस्या करनी पड़ती | याद है मुझे जमीन देखने मैं और पिताजी गए थे, पिताजी जमीन देख के माथे पर हाथ रखकर बैठ गए थे | उस जमीन पर अगले 2-3 साल खूब पसीना बहाना पड़ता, तब चौथे साल उस पर फसल आती | घर में मशवरा हुआ, बातचीत हुई, तय हुआ कि अब पिताजी को शहर जाना पड़ेगा | खेती में अब कुछ नहीं रखा | कई दोस्त पिताजी के गाँव से शहर गए थे | पिताजी भी चले गये, उन्ही की आस में | 
जब पिताजी शहर पहुंचे तब एक रिक्शा किराए पर लिया और चलाने लगे | धीरे धीरे दिल्ली को सड़कों से परिचित होकर सनसनाते हुए अपने काम को मन लगाकर करने लगे | ज्यादा दिन रुकने का इरादा नहीं था उनका, क्यूंकि शहर कितना भी बड़ा क्यूँ न हो, होता तो पराया ही है |
कुछ दिन बीते और दिल्ली में डेंगू, मलेरिया और ऐसी बीमारियां पुरजोर तरीके से फैलने लगी थी | लगभग हर दूसरा इंसान इसकी चपेट में था | पिताजी को भी एक दिन बुखार आया, पर उस दिन पिताजी ने उसे नजरअंदाज कर दिया | खैर क्या ही करते, एक दिन काम न करना कितना भारी पड़ सकता है ये वो बहुत अच्छे से जानते थे | दो तीन दिन बाद कमजोरी महसूस होने लगी और काम करना दूभर हो गया | तब डॉक्टर को दिखाना ही एकमात्र विकल्प था | पिताजी के रास्ते में दिल्ली के कई बड़े अस्पताल पड़ते थे | उन्ही में से एक बड़े अस्पताल में वो चले गये | जिस रोज पिताजी अस्पताल में गए थे उस रोज तक उनका डेंगू चरम पर पहुंच चुका था और प्लेटलेट्स का ग्राफ़ जमीन छूने की फिराक में था | पर किसी तरह हिम्मत जुटाकर वो ठीक होने की उम्मीद करके अस्पताल पहुचे |
दिल्ली यानी भारत की राजधानी, बड़ी बड़ी सड़कें, हवा से बात करती मेट्रो, आसमान छूती बिल्डिंग और हर दौर की एतिहासिक निशानी को अपनी गोद में संभाले हुई दिल्ली |
यहां के छाती पीट कर कहते हैं कि हमारे यहा से पूरा देश चलता है | खैर पिताजी अस्पताल पहुंचे | अब यहां डॉक्टर तक पहुंचने के लिए एक लंबी प्रक्रिया का सामना करना था | पहले आप लाइन में लगकर पर्ची बनवाएंगे, जिसमें आपको बताना होगा कि आपको क्या बीमारी है, फिर उस पर्ची पर आपको एक रूम नंबर मिलेगा, यानी कि आपकी बीमारी के हिसाब से आपको एक विशेषज्ञ डॉक्टर प्रेफर किया जाएगा | पिताजी पर्ची बनवाने के लिए काउंटर के पास पहुंचे, लाइन काफी लंबी थी, यही कोई 1-2 घंटे की, और बीच बीच में पर्ची बनाने वाले अधिकारी का जो फरमाइशी विराम हो रहा था उसे जोड़ा जाए तो कुल, ढाई - तीन घंटे | पिताजी भी उस लंबी लाइन में लग गये, लाइन में तरह तरह मरीज थे, और सब ढांढस बांधते हुए खड़े थे | वो लाइन खत्म होते होते तक पिताजी की तबीयत बिल्कुल खराब हो चुकी थी, वे बड़ी मुश्किल से खडे हो पा रहे थे | उनकी पर्ची बनी और वो बताए हुए रूम के पास पहुँचे | रूम के बाहर भी लंबी लाइन थी, यही कोई 1-2 घंटे की लाइन और बीच में डॉक्टर साहब के उठाए जाने वाले फोन को जोड़ लिया जाए तो अनिश्चित काल | खैर गिरते पड़ते ये लाइन भी खत्म हो गई, डॉक्टर तक पहुंचना काफी मुश्किल था, पर उम्मीद थी कि अब सब ठीक होगा | वहां पहुंचने के बाद, उनका नाम उम्र पूछकर कुछ दवाई दे दी गईं | हैरान करने वाली बात थी कि डॉक्टर ने उनकी ओर देखा तक नहीं, पूछा कि बुखार है, हाँ है, ठीक है ये लो दवाई | कितना है, कब से है, ये सब जानना हो सकता है गैर जरूरी हो, अजी बड़े शहरों के डॉक्टर भी अंतर्यामी होते हैं | वहां से निकलकर पिताजी बुरी तरह थक चुके थे | अब दवाई लेकर सीधा घर जाना था | दवाई लेने जब पहुंचे तब तक 1 बज चुके थे | लाइन यहां भी थी, काफी लंबी थी | इतना सब कर चुकने के बाद दवाई न लेना, सब व्यर्थ कर देता | यही सोचकर वे लाइन में लग गए | सब ठीक रहता तो उन्हे 3 बजे तक दवा मिल जाती | कुछ देर बिता और डेढ़ बज गए | लंच का समय हो गया और काउंटर बंद कर दिए गए | काउंटर के साथ साथ जहां लाइन लगी थी उस हाल की लाइट भी काट दी गई | थोड़ी ही देर में वहां नौ काउंटर पर लगे 1000 से ऊपर लोग, गर्मी से परेशान हो गए | 2 बजे लंच खत्म हो जाएगा, तब लाइट और लाइन दोनों चालू हो जायेगी, ये सोचकर लोगों ने सब्र कर लिया | कुछ देर बाद 2 बज गये, लाइट नहीं आई, लाइट नहीं आई तो काउंटर चालू नहीं हुआ | कुछ समय और बीता, लाइट को कटे हुए एक घंटे से ज्यादा हो चुके थे | ताज्जुब की बात है कि डॉक्टरों के केबिन में लाइट आ रही थी | खैर वो डॉक्टर हैं, और हम मामूली काम करने वाले उनसे कैसी बराबरी, लाइट आने की उम्मीद में सब लाइन लगे रहे | कुछ वक़्त और बीता, जनता आक्रोश में आ गई | बगावत के रूप में काउंटर के ऊपर लोगों ने जोर जोर से थपथपाना शुरू कर दिया | पिताजी वहीं खड़े थे लाइन में, खुद की संभाले हुए | मन ही रहा था बैठ जाएं, लेट जाएँ वहीं जमीन पर | थकान से विवश हो कर बैठ गए हाल के दरवाजे के पास जहां से थोड़ी ठंडी हवा आ रही थी | वहीं दूसरी ओर लोग बेकाबू हो रहे थे, जो काफी हद तक जायज भी था | लोगों को बेकाबू होता देख दो अधेड़ उम्र के गार्ड आए और अंधाधुंध डंडे बरसाना शुरू कर दिये | लोगों ने हाल की दूसरे गेट से हाल खाली करना शुरू कर दिया | लोग भाग रहे थे, दौड़ रहे थे | एक बात है कि छोटे लोग भीड़ में आक्रोश दिखा लेते हैं, पर निजी तौर पर या अकेले वे कुछ नहीं करते या कुछ करने की कोशिश नहीं करते क्यूंकि कहीं न कहीं वे जानते हैं कि वे जिस वर्ग से वे आते हैं वहां उनकी मदद करने वाला कोई नहीं | 
गार्ड डंडे के जोर पर लोगो को निकाल रहे थे, भागते दौड़ते लोगों में पिताजी कहीं पीछे रह गए, और भागते हुए अचानक उन्हे एक डंडा पड़ा और बिलखते हुए गिरे और वहीं चित हो गये| उनकी थकान उनकी आंखों से आखिरी बार आंसू बनकर बही और अपना पैर पकड़ कर, चिल्लाते हुए उन्होने जीने की आस छोड़ दी | उनके गिरने से किसी को फर्क शायद ही पड़ा हो | पीछे से गार्ड शायद किसी को समझा रहा था, "साले इतनी ही गर्मी है न तो प्राइवेट में दिखा लिया कर" |
उसके कुछ दिन बाद हमने पिताजी को खो दिया | सबको लगता है कि वो डेंगू की चपेट में आ गये | किसी को नहीं पता कि सिस्टम मेरे पिताजी को खा गया |
Story by Kavi Agyat

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