"मैं जी उठूंगा" Tales by Kavi Agyat - Hindi Biography World

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Sunday, October 21, 2018

"मैं जी उठूंगा" Tales by Kavi Agyat


और फिर आँखे बंद करते ही सारे मंजर आंखो के आगे आ जाते है | यूं लगता है जैसे तुम अभी भी मेरे कंधे पर अपना सर रख के, टकटकी लगाए ताक रही हो आसमान को, और आसमान टकटकी लगाए मुझे देख रहा हो जलन से |अब तो अक्सर ऐसा होता है कि हर चीज़ लगभग तुमसे जुड़ जाती है खुद ब खुद |अब तुम मेरे पास नहीं हो पर अब सही मायनों में तुम पास हो मेरे, क्योकि हर वो बुरा एब जो तुममे था वो जा चुका है, संग तुम्हारे, अब बची है तुम्हारी अच्छाइयाँ जिन्हे ख़ुद में उतारने की जद्दोजहद में मेरे दिन और रात गुजर जाते है | अब हर सहर यही चाहत होती है कि भुला दिया जाए तुम्हें सिरे से, दोपहर तक दिल और दिमाग कहते है कि याद रखेंगे पर नफ़रत से, और रात को सोते वक़्त यादें कहती है कि क्या जल्दी है, कल कर लेंगे नफ़रत |
और फिर एक दिन जब सांसे मद्धम हो चलेंगी, जब धड़कने आखिरी पड़ाव के लिए तेजी से दौड़ेंगी, तुम आना और वैसे ही पहले की तरह मेरे शर्ट के कॉलर को धमका के पकड़ के खींचना... मैं जी उठुंगा|

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