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Tuesday, October 16, 2018

"Meri shahzadi" Tales by Kavi Agyat


मैं तीन दिनों से उसके घर के बाहर ही बैठा था| घर के बाहर क्या उसकी गली के कोने पर जो चौराहा है, जहां से उसका चबूतरा बिल्कुल साफ दिखता है, मैं वही बैठा था, पिछले तीन दिनों से|उसका इंसान से हाड़ मांस रह जाने का सफर, मैंने उन तीन दिनों में वहीं बैठ कर देखा था|तीसरे दिन जब उसकी अर्थी उठी तब मैं दो कंबलों के बीच मूह छुपा के उसके पीछे पीछे चलता जा रहा था, डबडबाती आँखों से गिरते आंसुओं की आवाज, राम नाम सत्य के नारे के पीछे कहीं छुप जा रही थी|उसकी अर्थी का पीछा करते करते न जाने मैं कब सड़क पर गिर पड़ा,बेहोश होकर, चक्कर खाकर|शायद ये भी उसके चाहने से हुआ होगा, क्यूँकि वो अक्सर स्कूल के दिनों में कहा करती थी कि "ए गुंडे, मेरा पीछा मत किया कर समझा"| खैर जुलाई की धूप में कंबल लपेटकर 3 दिन रहने से इतना होना तो बहुत मामूली था|धीरे धीरे राम नाम सत्य का नारा, क्षीण होता गया, उसका काफिला मुझे छोड़ चुका था हमेशा के लिए|अब आंसूओ की टपटप के बीच एक धुन सुनाई दे रही थी, शायद मीलों दूर कोई नवप्रेमी, अपनी प्रेमिका को कह रहा हो,
"दिल की भोली है, तबीयत की बड़ी है सादी,
वादी-ए-इश्क से आई है मेरी शहज़ादी"
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©® Kavi Agyat

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