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Tuesday, October 16, 2018

"Tumhare shahar ki jheel" Tales by Kavi Agyat

आज यहां सुबह से बरसात हो रही है, यूँ लग रहा है जैसे तुम्हारे शहर कि किसी झील का पानी, अमादा हो मुझपर मोहब्बत लुटाने को | हाथों पर गिरती बूंदे, ऐसी लग रही हैं जैसे तुम आहिस्ते आहिस्ते मेरे हाथों को पकड़ने की कोशिश कर रही हो | हकीकत में नदारत हो तुम जाने कहाँ, पर बारिशों में मुझे तुम नज़र आ ही जाती हो | मैं जानता हूँ कि तुम्हें अब भी शक है कि मैं बेवफा हूँ, और सच कहूं तो मैं कभी अपनी वफा को साबित करने की जहमत नहीं करूंगा | मुझे समय ही नहीं मिलेगा, तुम्हारी तस्वीरों से, तुम्हारे खतों से, तुम्हारी उन अदाओं को बार बार याद करने से जिनमें थोड़ा बचपना भी है, थोड़ी नजाकत भी है और मोहब्बत तो बेहिसाब है | सच कहूं तो पूरे दिन मैं तुम्हें बिल्कुल भी याद नहीं करता | सच कहूं तो, सच कहूं कहकर जब भी मैंने सच कहा है, वो सच नहीं है | सच कहूं तो अब कोई जरूरत नहीं तुम्हारी मेरी ज़िन्दगी में, सच कहूं तो बहुत खुश हूं तुमसे दूर होकर, सच कहूं तो मोहब्बत कभी की नहीं थी तुमसे!
अच्छा सुनो, आज रेडियो पर वो गाना डेडिकेट किया था तुमने सुना क्या? अरे हाँ तुम्हारे रेगिस्तानों से घिरे शहर में रेडियो कहाँ चलता होगा...! हाहा..!
अच्छा सुनो...
"तुझमे रब दिखता है, यारा मैं क्या करूं...!"
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©® Kavi Agyat

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