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Thursday, November 8, 2018

सिपाही का संदेशा



सुनो तुम, हाँ तुम,
जो कल मुझे,
बक रहे थे गालियाँ,
करते नहीं कुछ फौजी,
बजाए किन्नरों की भांति तालियां,
तुम जो कह रहे थे,
सिपाही है क्यूँ शांत,
ना उठाते अस्त्र-शस्त्र,
हो जाए विक्रांत,
तुम जो कह रहे थे,
चलाए क्यूं ना गोलियां,
धीर वीर कब बनेंगे,
छोड़ेंगे कब माँ की चोलियां,
तुम वही जो रात कल सुकूं से,
खा रहे थे खाना,
बड़े ही आराम से,
सुन रहे थे गोविंदा का गाना ,
खाते खाते जब तुम्हारी,
उंगली मेज से टकराई थी,
तुम्हें रोता देख,
तुम्हारी माँ दौड़ती आई थी,
तुम वही जो परसो,
माँ पर,
नमक कम होने पर बरसे थे,
तुम वही जो नवरात्रि में,
लहसन प्याज को तरसे थे,
तुम वही जो ना सह पाता,
इक छोटा सा दुख ,
तुम वही जिसे केवल,
दिखे अपना सुख,
जानते हो कल फौजी एक,
बंदी था दुश्मनो के पास,
जानते हो क्या होता है,
कैद होने का अहसास,
फिर पता है, उसके मूह में,
रात भर काँच की बोतल छोड़ दी,
फिर उठ के सुबह,
बोतल वहीं तोड़ दी,
जानते हो कल किसी का,
सर कट गया,
उसका रोआं रोआं,
शिकारियों में बंट गया,
जानते हो, सातवीं में है,
उसकी छोटी सूता,
बच्चो को था सोचता हर पल,
बड़ा भावुक था पिता,
जानते हो मेरे घर में,
सन्नाटा छाया रहता है,
माँ पिता हसते है बस तब,
जब बेटा घर आया रहता है,
जानते हो मेरी प्रेमिका से,
किश्तों में प्यार करता हूं,
जानती है वो कि उसपर नहीं,
मैं तो बस देश पे मरता हूं,
जानते हो इक फौजी ने,
ख़ुद अपनी शादी तोड़ी थी,
सगाई की अंगूठी मिले रेत में ,
इतनी बारीकी से तोड़ी थी,
ये सियासत वाले हमारे भावों से,
यूँ खेल रहे है,
सोचो किस तरह किस कदर,
हम बेबसी झेल रहे है,
तुम्हारा क्या, तुम रोज,
नौलाख सितारो वाली रात देख लेना,
और हाँ मुझे बोलने से पहले
अपनी औकात देख लेना,
मैं जो खड़ा हूं,
अडिग अटल दिन रैन,
मेरे हाथ नहीं बंधे बस,
चाहिए वतन का चैन

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