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Friday, November 9, 2018

अब बात नहीं होती


मन मरुस्थल सूखा बिल्कुल, बरसात नहीं होती, 

मैं भारी मन से कहता हूं, अब बात नहीं होती,


मैं अब भी उसकी गलियों से आया जाया करता हूं, 

झूठा साबित होने पर उसकी कसमें खाया करता हूं,

ऐसा लम्हा नहीं होता, जब वो साथ नहीं होती, 

मैं भारी मन से कहता हूं अब बात नहीं होती,

ये नदियां ठहरी रहती है, ये उपवन सूखे रहते है, 

जो गुलाब छुपाए किताबों में, अब रूखे रूखे रहते है,

धूप तेज़ रहती मन में, सुहानी रात नहीं होती, 

मैं भारी मन से कहता हूं, अब बात नहीं होती,

सूरज तो रोज़ निकलते है, चंदा भी रोज़ ही ढलते है, 

पर यादों की लाशें लेकर, अब यहां वहां हम चलते है,

सीधे रस्ते है सारे अब, अगलात नहीं होती, 

मैं भारी मन से कहता हूं अब बात नहीं होती,

इन आंसुओं की पूर्ति होगी कब बातें मैं ये जानू, 

वो मंदिर वाला पत्थर वाला खुदा है मैं क्यूं मानूं,

ये मौत भी जाने क्यूं हाथो हाथ नहीं होती, 

मैं भारी मन से कहता हूँ अब बात नहीं होती,

मन मरुस्थल सूखा बिल्कुल, बरसात नहीं होती, 

मैं भारी मन से कहता हूं, अब बात नहीं होती,

Kavi Agyat

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