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Friday, November 9, 2018

मातम


क्यूं तन्हाइयों में मेरे पल निकल रहे है,
शायद बुरे कर्मो के फल निकल रहे है,
सोचा था टल जाएंगी बलाएं सारी राह की,
दानव बैठे राह में अटल निकल रहे है,

ना जाने यहां कौन अपने कौन पराए है,
कौन यहां अरमानो का मातम मनाने आए है,
कौन किस तरह मुझे लूटना चाहता है,
ज़िन्दगी की जेल से मन छूटना चाहता है,

सुनसान राहों में अक्सर भटकता रहता हूँ,
लोगो के मन में अक्सर खटकता रहता हूँ,
उनके फरेब अक्सर फांसी से लगते है,
ऐसी फांसीयो पे रोज मैं लटकता रहता हूँ,

बताओ और अपने छुपे हुए जज्बात क्या कहूँ,
मैं अपनी बेवकूफ़ीयो की बिसात क्या कहूँ,
आंखे धूल खा खा के फुट सी गई है,
मैं दिन को दिन या रात को रात क्या कहूँ,

ये वही लोग है जो अक्सर मेरे किस्से में आते है,
इनके ताने टोटके मेरे हिस्से में आते है,
मैदान भर गुरूर रखते है सीने में ये,
पर मौत के बाद अक्सर लोग दो बिस्से में आते है ,

अब इतना ही बचा है मजबूर हु बहुत,
तुम्हें लगता है सच्चाईयो से दूर हूं बहुत,
हर वक़्त हीन समझती हो ना मुझे,
तुम्हें खुद का लगता है कि हुर हूं बहुत,

तो आज तुम मेरा जवाब भी सुन लो,
नहीं मिलेगा मुझ सा चाहे जिसे चुन लो,
मैं तो अब झोंके से उड जाऊंगा कहीं और,
तुम अपने शहजादे के संग ख्वाब बून लो,

Kavi Agyat

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