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Thursday, November 8, 2018

इंतकाम

image source : google

हाँ है कुछ लोग,
जिनकी शक्ल देखकर,
उठती है तीखी नियत,
इंतक़ाम की,
फिर फिक्र नहीं रहती ,
अंज़ाम की या मकाम की,
बने शख्सियत,
चाहे रावण की या राम की,
चाहे कंस की या श्याम की,
चाहे कल को घिर जाऊँ मैं सलाखों में,
या गिर जाऊँ कइयों की आंखो में,
क्यूकि जिस बिच्छू को देखकर कहा था तुमने,
कि डंक मारना,
इसकी फितरत है, नियत है,
ये इसकी रोजमर्रा की हरकत है,
इसे मुआफी देने में बरकत है,
उसी बिच्छू को कभी किसी ने,
छोड़ा होगा इन्ही दलीलों के सहारे,
देखो तो ज़रा,
तब से अपने विष से,
कितने ही इसने मारे,
तो अब दायित्व है मेरा कि,
उसे कैद करूं या संहार करूं,
न कि उसे माफ करके,
ज़हर के कुल का विस्तार करूं,
और हां,
बड़े लोगों की,
अगर निशानी है,
 माफी देना,
तो मुझे छोटा ही रहने दो,
दो कौड़ी का!!!

Kavi Agyat

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