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Friday, November 9, 2018

महादेव वंदन


महाकाल वो , कैलाशी है,
अंत वही है, सर्वनाशी है,
है नाश वही, है विकास वही,
है हर दुविधा में आस वही,
जन मन का है कर्ताधर्ता,
है सूरो का भी विश्वास वही,

त्रिलोचन है, त्रिपुरारी है,
तारक है वो, जटधारी है,
ना दुनियादारी की समझ उसे,
कण मात्र नहीं संसारी है,
संग में प्रेतो का टोला है,
कुछ ऐसा मेरा भोला है,
वो वामदेव है, जोगी है,
वो केवल सोम का भोगी है,
वो अपनी धुन में मलंग है,
बेजुबानों के वो संग है,
गंगा है रुकी जटाओं में,
बसता सावन  की घटाओं में,
है शांति जब तक जटा बंधी,
है प्रलय खुली लटाओं में,
.
उसमे प्रकाश अनंत है,
वो हर प्राणी का अंत है,
वो राजा है इस धरती का,
मोह से दूर वो संत है,
हर जीव का वो रक्षक है,
और गले में उसके तक्षक है,
सर पर उसने है शशि रखा,
वो दुष्ट पदार्थों का भक्षक है,
सागर को झुका, गिरिश्वर वो,
है वीरभद्र, विश्वेश्वर है वो,
ईश्वर भी जिसके आगे झुके,
वो त्रिलोकेश, महेश्वर है वो,
.
पर्याय मृत्यु, कल्याणी है,
त्रिपुरांतक, मृगपाणि हैं,
प्रत्येक विलास चरणों में रहें,
वो सर पर चलता खाक लिए,
हर उर भय से कंपित होता है,
जब उठता है वो पिनाक लिए,
.
पशुपति जब क्रोधित होते है,
दुर्जन फिर आंसू रोते है,
जब खुलता है, कलजयी लोचन,
आतंकित हो उठता है हर इक मन,
फिर हर हर गंगे के नारे से,
सूरज से, चाँद सितारे से,
आकाश भरे यमदूतो से फिर,
पृथ्वी खाली हो कपूतो से फिर,
फिर क्या आदि क्या अंत यहां,
और कौन साधु क्या संत यहां,
हर जन का फिर उद्धार होता,
क्या वर्षा और क्या फिर वसंत यहां,

हे परसुहस्त, बैरागी तुम,
सारी दुनिया से बागी तुम,
अज्ञात का वंदन स्वीकार करो,
महादेव मेरा उद्धार करो,

Kavi Agyat

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