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Friday, November 9, 2018

आशंका


जैसे दूसरा छोर धरती का,
इंतजार करता है पूरा दिन,
सूरज से मिलने का,
फिर संझा को मिल के सुरज से,
जो खुशी आती है मिलन की,
वो संग लाती है जुदा होने की आशंका,
क्यूकि छोर जानता है,
कि रुकना होगा अभी पूरा एक दिन उसे,
और क्या हो जो कल छाए रहे बादल,

जैसे धरा तरसती है,
मिलने की बूँदो से,
साल भर इंतजार करती है,
सावन के आने का,
फिर जो खुशी होती है मिलन की,
लाती है जुदा होने की आशंका,
क्यूकि धरा जानती है,
मिलने को दुबारा रुकना होगा एक वर्ष,
और क्या हो जो अगले वर्ष सूखा हो,

ठीक वैसे तुमसे मिलने की खुशी तो है,
तुम्हें खोने का है गम,
ये विडंबना की ब्यार कब खत्‍म हो,
जाने किस दौर आ गए हम,

Kavi Agyat

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