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Friday, November 9, 2018

नफरत है मुझे कवियों से


नफरत है मुझे कवियों से

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हाँ सच है.. 
मैं नहीं हूं कवि, 
ना गुन है मुझमे, 
कवियों वाला, 
तम बिखरा हुआ है मुझमे, 
कवि तो होता है, 
रवियों वाला, 
ओज वालों की तरह, 
नहीं लड़ा मैं खिलाफ कुरीतियों से, 
शृंगार वालों की तरह, 
नाता मेरा नहीं प्रीतियों से, 
हास्य वालों की तरह, 
कब कहां मैंने किसी को हसाया है, 
रुदन वालों की तरह मैंने कब, 
आसूओं में किसी को फंसाया है, 
मेरे पास तो कलम है, 
दो सिक्कों के मोल की, 
अर्थवान लिखा कहां उससे मैंने कब, 
लिखी कविता शब्दो के झोल की, 
अंतर्मन से कहूं तो नफ़रत है मुझे कवियों से, 
जो ना मिटा पा रहे अंधकार उन रवियो से, 
ये जो हर कविता, हर गजल में व्यथित दिख रहे है, 
ये जो समाज का हर पहलू रो रो के लिख रहे है, 
जब समाज का अधिकांश तबका भ्रष्टाचारी है, 
तो भाई तुम्हारी क्या लाचारी है, 
जीवन जिया था दिनकर निराला ने जैसे, 
मौत भी आएगी कुटिया में वैसे, 
तो क्यू कर रहे हो कलम की सेवा, 
कोई व्यापार करो उसमे है मेवा, 
मेरी मानो तो न कोई बदलेगा, 
तुम्हारी कलम से,छोड़ो अपनी डायरी, 
सरकारी नौकरी की करो तैयारी, 
लिखना छोड़ो समाज की कायरी, 

Kavi Agyat

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