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Thursday, November 8, 2018

"आज़ादी" मुबारक



हो सकता हैं शायद,
लिखना मुझे नहीं आता,
मां पर लिखने बैठूं तो,
मैं लिख नहीं पाता,
सोचता हूँ क्या लिखूं,
कहाँ से शुरू करूं,
क्या कश्मीर की मनभावन वादी लिखूं,
या शीश कटाने को तैयार करोड़ो की आबादी लिखूं,
क्या मेवडियो के शौर्य की गाथा लिखूं,
या वीरों में आला मराठा लिखूं,
क्या बिहार के शेरों की नुमाइश करूं,
या कलाम को फिर देख पाने की ख्वाहिश करूं,
पंजाबी सिंहों की दहाड़ों का वर्णन करूं,
या हिमालय की भृकुटी पर चढ़कर मैं गर्जन करूं,
क्या सेना की विजयों का कालजयी  इतिहास लिखूं,
या ब्रिटिश दानवों के मंसूबों का सर्वनाश लिखूं,
सफेद धरा, मनोहर कच्छ का रण लिख डालूँ क्या,
या मांझी का आमरण प्रण लिख डालूँ क्या,
नेहरू के श्वेत कबूतरों की उड़ान लिख डालूँ मैं,
या बोस के इरादों को चट्टान लिख डालूँ मैं,
सतलुज, गंगा, कावेरी की धारा लिख दूँ मैं,
कैसे इन शब्दों में हिंदुस्तान सारा लिख दूँ मैं,
लिख कर इतना सब जब मन मेरा हर्षायेगा,
एक कहीं कोना दिल का फिर, मुझपर लानत खायेगा,
अबलाओं की व्यथाओं का रुदन कैसे भूलूं मैं,
राजनीति में क्षीण हो रहा कुंदन कैसे भूलूं मैं,
कठुआ, मंदसौर कैसे भूलूं, कैसे भूलूं मेवातों को,
कैसे भूल जाऊं मैं, दिल्ली की सहमी सहमी रातों को,
उस बुढ़िया की आंखों को जो, चावल के लिए रोई थी,
न जाने सरकारों की सुधि किन जलसो में खोई थी,
गलियों में सन्नाटा है, और नुक्कड़ पर बैठे दंगे हैं,
मीठे बोल बांचने वाले, अंदर से कितने नंगे हैं,
लाज बेचकर खाई है, और दुत्कारों का मोल नहीं,
विष की खेती मत करो, ये माटी है मखौल नहीं,
जाने कैसे निरे जानवर, आपा अपना खो देते हैं,
कृत्यों को उनके सुनते सुनते, शहीदों के नैन रो देते हैं,
जीतों का अब जश्न भी हो पर, मंथन भी हो हारों का,
आजादी का मोल समझ, सत्कार करो त्योहारों का,
जो ना समझे कलमों से, उन्हे समझाना तलवारों से,
दुश्मन का चित भयावह हो, हम सिंहों की ललकारों से,
आंतरिक बुराइयों को परखे बिना, अच्छाइयों के गीत नहीं गाता,
सच कहता हूँ बंधु, मुझे लिखना नहीं आता!

Kavi Agyat

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