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Friday, November 9, 2018

आलौकिक मिलन


आज लबों को,
रखा जो लबों पे,
गाने लगी सांसे,
उनके लब खुल गए,
इक समंदर,
है तेरे अंदर,
लगा यूं, मेरे वजूद के दाग,
सब धूल गए,
आंखो की बेचैनीयों को राहत मिली,
जो तेरी जुल्फों की, हाथो को चाहत मिली,
धड़कते दिल दो, जब इतने पास हो गए,
धड़कने तराना कुछ गानें लगी,
ये अलौकिक मिलन दिलों का,
खुसबूएं हवा को बताने लगी,
इक सुखी जमीं पे बरसती रही,
वो बूंद जैसे, मुझमे समाती गई ,
इतना पास कभी मैं खुद के ना था,
जितना पास मेरे वो आती गई,
कितना पाषाण हृदय था मेरा कभी,
तूने छु दिया, लहजा जुदा हो गया,
अब ये सारा जमाना मुझसे हारा लगे,
यूँ लगे अज्ञात का खुदा हो गया,
Kavi Agyat

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