गिर पड़ा धरती पर एक विशाल वृक्ष - Hindi Biography World

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Saturday, November 10, 2018

गिर पड़ा धरती पर एक विशाल वृक्ष

गिर पड़ा धरती पर एक विशाल वृक्ष 




गिर पड़ा धरती पर एक विशाल वृक्ष, 
था तना और था बड़ा खुशहाल वृक्ष, 
दूर अनंत संभावनाओं से होकर परे, 
मोती छुपाकर बैठा था वह जड़ में खरे, 
नाजुक से कपोल पर, खिल चुके थे फूल तब, 
न था मौसम पतझड़ और न वहां थे शूल तब, 
था बसंत, न था अंत, सब यही थे जानते, 
अंतरिक्ष भी झुक जाएगा, सब यही थे मानते, 
फैली हुई डालियों से, रास्ते बनाता था, 
ऊपर की ओर वह, बढ़ता ही चला जाता था, 
हर तरह के पक्षियों को, गोद में समेटकर, 
लाड वह दिखाता था, कान भी उमेटकर, 
एक पक्षी भी नहीं है, दृगों के समक्ष अब, 
रख चुका हूं पक्षियों को, गिरगिटों के समकक्ष अब, 
एक बेल भी थी वहीं, थोड़ी सी ही दूर पर, 
वृक्ष भांति तन न सकी, थी बड़ी मजबूर पर, 
बीज प्रेम के भी मगर, मध्य उनके सींच रहे थे, 
बेल के भी सिरे, वृक्ष की तरफ ही खींच रहे थे, 
धीरे धीरे बेल वृक्ष की तरफ़ ही बढ़ चुकी थी,
इक कहानी, प्रेम की, प्रकृति मन में गढ़ चुकी थी, 
वृक्ष ने बाजुओं में बेल को भी धर लिया था, 
वृक्ष की ऊंचाई देख बेल ने भी, मन भर लिया था, 
था बड़ा ही प्रेम और सद्भाव का माहौल तब, 
मगर बेल चाहती थी बनना, वृक्ष सी सुडौल तब, 
धीरे धीरे नियति ने बेल कि नीयत भी दिखाई, 
वृक्ष ने भी रोक ली अपनी बढ़ती ऊंचाई, 
बेल भी कुछ माह में, वृक्ष के थी अर्श पर, 
थी वही यह बेल जो, थी कभी कहीं फर्श पर, 
अंतरिक्ष के स्वपन थे, और बेल मद में चूर थी, 
प्रेम हाशिये पर था, वह वृक्ष से भी दूर थी, 
है यही इतिहास, कि अभिमान ही तो काल है, 
जीवन मृत्यु सत्य है, बाकी झूठ बहरहाल है, 
मेघों के धवल पर, तूफान चढ़के आया था, 
दामिनी के तीरों को बेल पर गिराया था, 
वर्षा जमीन पर गिर रही थी धीरे धीरे, 
बेल की मति भी फिर रही थी धीरे धीरे, 
धीरे धीरे बेल को होश भी आ रहा था, 
प्राण का दीपक मगर, बुझने तब जा रहा था, 
बेल चली जा चुकी थी, प्राण अपने छोड़कर, 
मेघ भी जा चुके थे, अभिमान उसका तोड़कर, 
विरह में गिरा तब, बन गया प्रेमपाल वृक्ष, 
गिर पड़ा धरती पर, एक विशाल वृक्ष, 

Kavi Agyat

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