100 ग्राम गेहूं - Hindi Biography World

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Monday, December 10, 2018

100 ग्राम गेहूं



दरिद्र का बालक सड़क पर ऎसे कुछ मुस्काया,
राशन की दुकान के बाहर, सौ ग्राम गेहूं था पाया,
ये क्षुद्र सी दौलत पाकर, वह इस कदर, हर्षाया,
स्वर्ग के देव प्रसन्न हुए थे, बस देख के उसकी छाया,
.
इठलाते, शर्माते, हुआ वो घर को रवाना,
मन में थी उमंग उसके, आज खाऊंगा खाना,
जानता हूं, उसका हर खयाल था बचकाना,
भुजवाने की सोच रहा था, ये एक पसेरी दाना,
.
उसके मन मे दुविधा थी, किस कदर हो बंटवारा,
अन्न है थोड़ा, और खाने वाले ग्यारह,
हिसाब लगाया उसने, अपाहिज बाप को ज्यादा दूंगा,
छोटी बहन को कम देके, गत माह का बदला लूंगा,
.
भाइयों को ज्यादा दूंगा, घर में तीन है भाई,
एक उसके पिता के है, 2 है चाचा की कमाई,
पिछले साल की गर्मी में हुआ था चाचा का स्वर्गवास ,
चाची भी चल बसी थी, ख़तम हुई थी आस,
.
दादाजी थे वीर बहादुर, बस एक कमाने वाले,
कुएं खोदते थे गाँव में, साफ करते थे नाले,
उनको भी गम कम ना था, उनको भी था शिकवा,
पिछली सर्दी बाएं पांव पर,मार गया था लकवा,
.
क्षण भर बाद में उस बालक का घर आया,
माँ को देख गर्व से उसका मन हर्षाया,
.
बोला जाके मा से अपनी, मा लाया हूं दाना,
खूब मन से, पूर्ण विधी से इसको तूम पकाना,
पिताजी के लिए जाके कल ले आऊंगा दवाई,
कह दो दद्दा से ठिठुरे ना परसों लाऊंगा रजाई,
.
बालक के मन में देख बड़े बड़े यह सपने,
झट मूड़ कर बाजू मा ने, आसु पोछे अपने,
लाड लड़ाने को, मा का मन था लालचाया,
आज मेरा लाल कमाई करके आया,
.
बालक का मन रखने को उसने उपली एक जलाई,
उस पर छोटी सी एक टूटी हुई, कटोरी एक चढ़ाई,
हे हे क्या देखता हूं मैं, आ गईं अन्नपूर्णा माता,
जिन्हे भेजने वाले थे स्वयं सृष्टि के दाता,
.
फिर तो पके भोग छप्पन, पूरे घर ने खाया,
दरिद्रों की आदत है साहब नहीं करते वे जाया,
.
हस लूं, रो दूं, ख़ुश हो जाऊं,
मैं देख दुनिया का झोल,
उसी सड़क पर महक रहा था,
नेताजी की पिछलग्गू गाड़ी का लीक हुआ पेट्रोल,

Kavi Agyat

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1 comment:

  1. Har baar ki tarah dil chho liye par ankhe bhi nam ho gayi....bahut hi touching tha yaar

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