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Monday, December 10, 2018

बस तेरे आगे ही सजदा


बचपन से बिल्कुल रूखा हूं,
तन मन से भी मैं सूखा हू,
मुझे खबर ना थी जमाने की,
फिक्र की थी तो बस खाने की,
कह सकती हो मजबूर था,
या औरो की तरह कहो, मगरूर था,
तुम हाथ फेरती हो जब गालों पर,
टिप्पणी करती हो  बालों पर,
ये लौह, मोम बन टहकता है,
मेरा मन अडिग, बहकता है,
मैं दुनिया से कटने लगता हूं,
दो हिस्सों में बंटने लगता हूं,
इक हिस्सा कहता है मुझको,
दुनिया में और भी लड़कें है,
एक से बढ़कर एक बहादुर,
शक्ल अकल से तड़के है,
तुझ पर ही बस क्यू उसका मोह है,
कहीं ये छल का गिरोह है,
इक हिस्सा तुझे बेहतर कहता,
बस तेरे ख्वाबो में रहता,
दिन भर बस तेरा बखान करे,
तेरी खुसबू का रस पान करे,
इन दोनों को मिला के मैं हू,
मैं जो, पत्थर का टुकड़ा,
बस तेरे आगे ही सजदा,
बाकी जग से हूं उखड़ा,

Kavi Agyat

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#long_distance_relationship
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