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Monday, December 10, 2018

मैं हार गया आज भी


आज फिर स्टैंड पर,
बस के, सुबह सुबह,
सामना हुआ उससे,
उसकी आँखे ज्यों,
पूछ रही थी कुछ मुझसे,
मेरी धड़कने तेज थी,
रूह संभल रही थी,
हाथ में डेरी मिल्क थी,
 पिघल रही थी,
आज वो दिन था,
जो आता है साल में एक बार,
आज वो दिन था जब उम्र कम होती है,
पर मनाते है फिर भी लोग,
उत्सव इस दिन का,
आज जन्म दिन था उसका,
मुझे पता चला था, सूत्रो से,
जासूसों से,
मैं हाथ में लाया था,
इक छोटी सी सौगात,
और साथ में. करनी थी,
इक बड़ी बात,
मुझे उससे इकरार करना था,
जीना था, उसपर मरना था,
पर मैं ढीला ढाला सूस्त इंसान,
पड़ा रह गया सोच में,
वो आई और चली गई,
बैठ के बस के कोच में....
Kavi Agyat

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